Wednesday, 20 May 2015

मैं हूँ कि नहीं

तेरी आँखों में देखकर करीब आने का दिल करता है
तेरे करीब आने पर तुझमें डूब जाने का दिल करता है
तेरा हि बस हो जाने का दिल करता है।
तेरी आँखों की रंगीन मस्तियाँ ,तेरे होठों की नर्मियाँ।
तेरी साँसों का हल्कापन ,तेरी आँखों में गीलापन।
मुझे मजबूर करता है।
अगर मैं चलते चलते रुक जाऊं ,या रुक-रुक कर मैं चलूँ।
मैं अगर चीज़ों को भूल जाऊं या फिर याद करने की कोशिश करूँ।
अगर मैं अलग हि दुनिया में खो जाऊं या फिर इस दुनिया में होकर भी न रहूँ।
अगर मेरा दिल ,मेरी रूह ,मेरा जिस्म ,मेरा मन ,मेरी हर एक चीज़ , जब
मुझमें होकर भी मुझमें न हो। सबकुछ ही  मुझको मेरी नज़र से अलग दिखे।
जब मेरा मन मुझसे कुछ कहने लगे ,मेरा दिल मुझसे कुछ बातें करने लगे।
मेरा गला जब सूखने लगे ,दिल की हर एक धड़कन जब दिल से बातें करने लगे।
मेरा अंग अंग मुझे अलग सा लगने लगे। मेरा रोम रोम जब धड़कने लगे।
जब मेरी पुकार मुझे ही पुकारने लगे। तब मैं जियूँ तो किस वजह में जियूं।
क्या है ये?
ये मैं हूँ ,ये मुझमे है। ये मुझसे है। ये मेरा है।
मैं ही इसकी वजह हूँ और मैं ही इसका वजूद भी,
तो क्या सिर्फ मुझसे ही इसकी उपज है और मुझमें ही ये सब है।
क्या कुछ और नहीं , क्या कोई और नहीं है ?
है न……… प्यार ,सपने(dreams),मेरी परिकल्पना ,मेरी उमंग ,मेरा विश्वास ,मेरा भरोसा
मेरा दिल,मेरी जान ,मेरी परछाई ,मेरा मान ,मेरा सम्मान ,मेरा ईमान ,मेरा नाम ,मेरी पहचान।
मैं हूँ भी कि नहीं ,खो गया हूँ मैं सपनों में सो गया हूँ मैं। 

No comments:

Post a Comment